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मंगलवार, 21 जनवरी 2025

प्रस्‍तावना


ॐ श्री गणेशाय नमः

प्रिय पाठक,

जीवन के इस कलियुग में हम सब किसी न किसी रूप में मानसिक, शारीरिक या आर्थिक कष्टों से जूझ रहे हैं। इसका एक मुख्य कारण है — सत्य ज्ञान का अभाव। जब मनुष्य को उचित दिशा नहीं मिलती, तो वह अज्ञान के अंधकार में भटकता रहता है। यह समझना आवश्यक है कि मानव जीवन की प्रगति और समाज की समृद्धि, केवल और केवल सही ज्ञान के आलोक से ही संभव है।

इस ज्ञान को देने का उत्तरदायित्व गुरु पर होता है। हमारे सनातन धर्म ने गुरु को इतना उच्च स्थान दिया है कि उन्हें त्रिदेवों से भी ऊपर माना गया है। सही मायनों में, एक सच्चा गुरु अपने शिष्य को सही मार्ग दिखाकर उसकी उन्नति सुनिश्चित करता है।

किन्तु आज के युग में, जब हर सफलता की कसौटी केवल धन और पद बन चुकी है, तब कई गुरु और धार्मिक मार्गदर्शक भी अपने मार्गदर्शन को व्यवसाय बना चुके हैं। उनका उद्देश्य अब शिष्य का आत्मोद्धार नहीं, बल्कि स्वयं की जीविका अर्जन रह गया है। यही कारण है कि अनेक लोग भ्रमित होकर केवल अपनी सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति हेतु इनका अनुकरण करते हैं, परन्तु आत्मिक शांति और ज्ञान से वंचित रह जाते हैं।

अब प्रश्न उठता है — सच्चे गुरु की प्राप्ति कैसे हो?
इसका उत्तर हमें श्रीमद्भगवद्गीता में मिलता है:
"कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्"
अर्थात, जब भौतिक गुरुओं में दोष हो, तब हमें ईश्वर को ही अपना गुरु मान लेना चाहिए। उनके वचनों, धर्मशास्त्रों, और जीवन सिद्धांतों का पालन ही आत्म-कल्याण का एकमात्र मार्ग है।

प्राचीन काल में हमारे ऋषि-मुनियों ने वेद, उपनिषद, पुराण आदि ग्रंथों की सरल व्याख्याएँ कर हमें जीवन जीने की श्रेष्ठ प्रणाली दी। यदि हम श्रद्धा और धैर्य से इनका अध्ययन करें और जीवन में उतारें, तो न केवल स्वयं का विकास संभव है, बल्कि एक संतुलित और आध्यात्मिक समाज का निर्माण भी होगा।

हमारे पौराणिक ग्रंथ ज्ञान का एक ऐसा अमृत-स्रोत हैं, जो मानवता के कल्याण के लिए सतत प्रवाहित हो रहा है। इनका एक डुबकी मन के दोषों को मिटाने में सक्षम है।

चूँकि मेरा जन्म एक आध्यात्मिक वातावरण में हुआ, अतः मुझे बाल्यकाल से ही धर्म, जीवन के उद्देश्य और आत्मविकास की दिशा में स्वाभाविक रुचि रही। जीवन के विभिन्न चरणों में मैंने कई ज्ञानीजनों, साधुओं और गुरुओं के उपदेशों को सुना और आत्मसात करने का प्रयास किया। कभी-कभी भ्रमवश मैंने अनुचित व्यक्तियों को भी गुरु माना, और उनके कार्यों का निरीक्षण कर सीखा कि केवल बाह्य आडंबर से कोई सच्चा गुरु नहीं बन जाता।

मेरी यह खोज अंततः वेदों, उपनिषदों और विशेषकर श्रीमद्भगवद्गीता के गंभीर अध्ययन पर आकर ठहरी। भगवद्गीता ने मुझे जीवन का मर्म समझाया और भीतर की शांति प्रदान की।

ईश्वर की कृपा से, जीवन की आपाधापी में भी मुझे अध्ययन का समय मिलता रहा। अब जब मैं अपने जीवन के अनुभवों को आपके साथ साझा कर रहा हूँ, तो मेरा उद्देश्य केवल यही है कि आप भी इन ग्रंथों के अध्ययन से आत्मिक जागृति की ओर अग्रसर हों।

यदि इस प्रयास में कभी कोई त्रुटि हो जाए, तो मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि मुझे अवश्य सचेत करें। कृपया विवेकपूर्वक केवल वही ज्ञान ग्रहण करें, जो आपके जीवन में सच्चा प्रकाश भर सके — जैसे मानसरोवर का हंस केवल दूध को ग्रहण करता है।

और यदि मेरे इस विनम्र प्रयास से केवल एक व्यक्ति भी लाभान्वित होता है, तो मैं इसे सफल मानूंगा।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः




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